Friday, 24 July 2026
किताबें कैसे पढ़ें
‘कुछ किताबों को चखा जाता है, कुछ निगली जाती हैं, कुछ चबा-चबाकर खाई जाती हैं।’’ इसलिए किताब हाथ में लेकर उसकी पृष्ठ-संख्या देखते, भूमिका पढ़कर, या अध्याय-सूची देख कर एक आकलन तो किया ही जा सकता है। कई लोग एक सरसरी नज़र में पूरी किताब से एक बार पहले गुज़रते ही हैं। उन लोगों में मैं भी हूँ, लेकिन यह ज़रूरी ही हो, ऐसा नहीं। यह सतही आकलन करना ग़लत भी हो सकता है, जब आप किताब को लेखक की पहचान की वजह से, ख़राब पन्नों की वजह से, या कुछ हिस्सों की वजह से ख़ारिज कर दें और किताब असल में अच्छी निकले।
अकादमिक किताबों में यह सतही आकलन कर लेना तो अच्छा रहता ही है। लेकिन अज्ञेय की पुस्तक का क्या सतही आकलन होगा? क्या सूँघना, क्या चखना? यहाँ तो सीधे चबाना, पचाना शुरू किया जा सकता है। अपनी किताबों के खाने या अलमारी पर नज़र डाल यह देखिए कि कितनी किताबों की पंक्तियाँ-संदर्भ-कहानियाँ स्मरण हैं। अगर नहीं हैं, तो वे बस सूँघ-चखकर रख दी गईन। चबा-चबाकर खाई-पचाई नहीं गईं। या तो पढ़ने का तरीक़ा ठीक नहीं था,
किताबें कैसे पढ़ें
किताबें कैसे पढ़ें
1. प्रेमचंद की गोदान
हिंदी साहित्य में प्रेमचंद और उनकी लेखनी से कौन वाकिफ़ नहीं है ? प्रेमचंद का ये उपन्यास उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से है। हिंदी भाषा में तो ये 1936 में ही प्रकाशित हो गया था, लेकिन अंग्रेजी में इसका अनुवाद 1987 में हुआ। गोदान जिस समय लिखा गया था, उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। इस उपन्यास में उस समय के भारतीय समाज और परिवार की दशाओं को नपे-तुले शब्दों में ब्यान किया।
2. श्रीलाल शुक्ला की रागदरबारी
1970 में इस पुस्तक के लिए इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया था। ये गांव-देहात के ऊपर लिखा व्यंग्यात्मक शैली में कटाक्ष है। ये आज़ादी के बाद के भारत की तस्वीर को दिखता है। शिवपालगंज नाम के गांव से कहानी शुरू होती है। इस गांव में लगातार घट रही घटनाओं से कुव्यवस्था की बखियां उधेड़ी गई हैं।
3. मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन
ये एक नाटक है जिसमें कालिदास और मल्लिका के प्रेम को दिखाया है। इस नाटक को समाज की परिस्थितियों व वर्तमान हालातों से जोड़कर देखा जा सकता है। इसको पढ़ने पर ऐसा लगता है जैसे कहानी आज के जमाने में ही लिखी गई हो। समाज में लोग प्रेम को किस नज़र से देखते हैं, इसके लिए इससे अच्छी कोई पुस्तक हो नहीं सकती।
4. खुशवंत सिंह की पाकिस्तान मेल
1947 में भारत-पाक के विभाजन का प्रभाव किस तरह से एक गांव पर पड़ता है। इस उपन्यास का मुख्य किरदार जग्गा अंत में हीरो साबित होता है। खुशवंत सिंह ने उस दौर के हालातों को देखा है, महसूस किया है। इसी दर्द भरे जज़्बात को उन्होंने अपने इस उपन्यास में लिखा।
5. तसलीम नसरीन द्वारा लिखी लज्जा
इस किताब में बांग्लादेश के हालातों और वहां रह रहे लोगों के साथ घटित होती घटनाओं को शब्द दिए गए हैं। अयोध्या में जब बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया तो बांग्लादेश के समाज में उसका क्या प्रभाव पड़ा उसको यहां बखूबी बताया गया है। तसलीमा को बांग्लादेश से देश निकाला दे रखा है। उनकी किताबों को भी वहां बिकने नहीं दिया जाता।
6. गांधी जी की सत्य के साथ मेरे प्रयोग
ये गांधी जी की आत्मकथा है। इसमें उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों का साझा किया है। गांधी जी के अनुभवों से पूरी दुनिया सीखती है, क्योंकि सत्य की राह पर चलने में उन्हें किस-किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। ये आप इस किताब को पढ़कर आसानी से समझ जायेंगे।
7. अमृता प्रीतम की पिंजर
इस किताब की पूरी भूमिका विभाजन पर टिकी है, वैसे ये मुख्तय पंजाबी भाषा में लिखी गई थी। खुशवंत सिंह ने इसका अनुवाद हिंदी में किया। इस पर एक फ़िल्म भी बन चुकी है। इस फ़िल्म को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से नवाजा गया। ये उपन्यास एक हिंदू लड़की पूरो और मुस्लिम लड़के राशिद की प्रेम कहानी है।
8. भीष्म साहनी का तमस
भारत में विभाजन से सात दिन पहले की एक काल्पनिक-सी घटना जो बिल्कुल सच्ची प्रतीत होती है। इन्हें 2002 में साहित्य अकादमी और 1998 में पदम भूषण से सम्मानित किया गया। इनकी इस किताब को पढ़ना प्रत्येक भारतीय के लिए जरूरी है, क्योंकि इसमें विभाजन के दौरान हो रही घटनाओं को केंद्र में रखकर अराजकता को जुबान दी है।
9. कमलेश्वर का कितने पाकिस्तान
ये एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें तथ्यों को काल्पनिकता के धागे में पीरो कर कमेलश्वर ने एक सर्जनात्मक कहानी लिखी है। 2003 में उन्हें इस उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ये उपन्यास हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर आधारित है। लोग मानते हैं कि कमेलश्वर के अंतद्वंदव का परिणाम है।
10. गुनाहों के देवता
इसके लेखक धर्मवीर भारती है। शुरूआती दौर में भारती जी का ये उपन्यास सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वालों में से एक था। इस उपन्यास में कहानी का नायक चंदर सुधा से एक तरफ़ा मोहब्बत करता है लेकिन किसी कारणवश उसकी मोहब्बत अंज़ाम तक नहीं पहुंच पाती और वो एक संवेदनशील से गुनाह का अभियुक्त हो जाता है।
सबसे ज्यादा वे किताबें पढ़ी जाती हैं जो पाठक कहीं से चुरा कर लाता है। किताब चुराने का जोखिम तभी उठाया जाएगा, जब किताब नजर तो आ रही हो, लेकिन हमारे पास न हो। कई बड़े लेखक किताब चोर रहे हैं। यह एक कला है।
फिर उन किताबों का नम्बर आता है जिन्हें हम उधार मांग कर तो लाते हैं, लेकिन वापस नहीं करते। करना ही नहीं चाहते। जिसके यहां से उधार लाये थे, उसके घर आने पर छुपा देते हैं।
फुटपाथ पर बिक रही अचानक नजर आ गयी वे किताबें भी खूब पढ़ी जाती हैं, जिनकी हम कब से तलाश कर रहे थे।
पूरे पैसे देकर खरीदी गयी किताबें भी अपना नम्बर आने पर आधी-अधूरी पढ़ ही ली जाती हैं।
लाइब्रेरी से लायी गयी किताबें पूरी नहीं पढ़ी जातीं और उन्हें वापिस करने का वक्त आ जाता है।
रोजाना डाक में उपहार में आने वाली या किसी आयोजन में अचानक लेखक के सामने पड़ जाने पर भेंट कर दी गयी किताबें कभी नहीं पढ़ी जातीं। कई बार तो भेंट की गई किताबें भेंटकर्ता के जाते ही किसी और पाठक के पास ठेल दी जाती हैं। वह आगे ठेलने की सोचता रहे या बिन पढ़े एक कोने में रखा रहे।
कोर्स की किताबें पढ़ने में हमारी नानी मरती है और समीक्षा के लिए आयी किताबें भी तब तक पढ़े जाने का इंतजार करती रहती हैं, जब तक संपादक की तरफ से चार बार अल्टीमेटम न मिल जाये। तब भी वे कितनी पढ़ी जाती हैं। हम जानते हैं।
पुस्तक मेलों में खरीदी गई किताबें भी पूरे पढ़े जाने का इंतजार करते करते थक जाती हैं और अगला पुस्तक मेला सिर पर आ खडा ़होता है।
यात्रा में टाइम पास करने के लिए स्टेशन, बस अड्डे या एयरपोर्ट पर खरीदी गयी किताबें यात्रा में जितनी पढ़ ली जायें, उतनी ही। बाकी वे कहीं कोने में या बैग ही में पड़े-पड़े अपनी कहानी का अंत बताने के लिए बेचैन अपने इकलौते पाठक को वक्त मिलने का इंतजार करती रहती हैं।
हर व्यक्तिगत लाइब्रेरी में लगातार कम से कम 40 प्रतिशत ऐसी अनचाही किताबें जुड़ती जाती हैं, जो एक बार भी नहीं खुलतीं। इनमें किताबों का कोई कसूर नहीं होता, जितना उनका गलती से वहां पहुंच जाने का होता है।
किताबें दो जगह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाती हैं। अच्छे पाठक के हाथ में खराब किताब पड़ जाने पर और अच्छी किताब के खराब पाठक के हाथ में पड़ जाने पर। आसाराम की आत्मकथा मेरे लिए बेकार है और मेरी आत्मकथा आसाराम के लिए बेकार है।
किताबें सबसे अच्छा उपहार
ये मेरे नोट्स हैं। आपके अनुभव निश्चित रूप से अलग हो सकते हैं। मेरा मानना है कि जब भी यात्रा पर निकलें, आपके बैग में दो किताबें होनी चाहिए। एक किताब जाते समय और बाहर ठहरने के दौरान पढ़ने के लिए और दूसरी किताब वापसी की यात्रा के लिए। यात्रा के दौरान जो किताब पढ़ ली जाए, उसे घर वापिस लाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है क्योंकि वह किताब फिर कभी खोली ही नहीं जाएगी।
यूं करें कि यात्रा के दौरान जो व्यक्ति आपको सबसे ज्यादा प्यारा लगा हो, जिसने आपकी खूब सेवा की हो या आपका ख्याल रखा हो – उसे यादगार के रूप में पढ़ ली गई किताब भेंट कर दें। यकीन मानिए जितनी खुशी उस पाठक को आपकी वह किताब पा कर होगी उससे ज्यादा खुशी आपकी किताब को होगी कि आपने उसे एक और पाठक तक पहुंचाया है।
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